खरवार समाज : एक विस्तृत अध्ययन (भाग–1)
(प्रस्तावना, भौगोलिक विस्तार, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि)
प्रस्तावना
भारत एक बहु-सांस्कृतिक और बहु-जातीय राष्ट्र है जहाँ हजारों समुदाय अपनी विशिष्ट पहचान के साथ सह-अस्तित्व में रहते हैं। इन समुदायों में जनजातीय समाजों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। इन्हीं जनजातीय समाजों में एक प्राचीन और गौरवशाली समाज है — खरवार समाज। यह समाज अपनी परिश्रमशीलता, प्रकृति से गहरे संबंध, सामूहिक जीवन पद्धति और नैतिक मूल्यों के लिए जाना जाता है।
खरवार समाज ने सदियों से जंगल, पहाड़ और कृषि-आधारित जीवन को अपनाते हुए अपनी संस्कृति को जीवित रखा है। आधुनिक समय में भी यह समाज अपनी पहचान को बनाए रखते हुए शिक्षा, सेवा और विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इस निबंध में हम खरवार समाज के इतिहास, संस्कृति, परंपराएँ, सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक विश्वास, आर्थिक जीवन, समकालीन चुनौतियाँ और भविष्य की संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन करेंगे।
भौगोलिक विस्तार
खरवार समाज मुख्य रूप से भारत के पूर्वी और मध्य भागों में पाया जाता है। इसके प्रमुख क्षेत्र हैं — झारखंड, बिहार, उत्तर प्रदेश (मिर्ज़ापुर, सोनभद्र, चंदौली), छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा के कुछ हिस्से। इन क्षेत्रों की भौगोलिक विशेषता पहाड़ी, वनाच्छादित और नदी घाटी वाली है, जिसने खरवार समाज की जीवनशैली को आकार दिया है।
इन क्षेत्रों में कृषि, वनोपज संग्रह और पशुपालन मुख्य आजीविका रहे हैं। इसलिए यह समाज प्रकृति को माता के रूप में देखता है और उसके संरक्षण को धर्म मानता है।
नाम की उत्पत्ति
"खरवार" शब्द की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों में विभिन्न मत हैं। कुछ विद्वान इसे "खर" (घास या जंगल) और "वार" (रक्षक) से जोड़ते हैं, जिसका अर्थ होता है — जंगल की रक्षा करने वाला। कुछ इसे प्राचीन जनजातीय नाम से जोड़ते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इस समाज का मूल संबंध वन और भूमि से रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
खरवार समाज का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। यह समाज आर्य-पूर्व काल से भारत की भूमि पर निवास करता आ रहा है। कई इतिहासकार इन्हें प्राचीन भारत के वनवासी समुदायों से जोड़ते हैं जिनका उल्लेख रामायण, महाभारत और पुराणों में मिलता है।
मध्यकाल में खरवार समाज ने अपने क्षेत्रों की रक्षा की और कई बार बाहरी आक्रमणों का सामना किया। कुछ क्षेत्रों में इनके छोटे-छोटे राज्य या गणराज्य जैसे स्वरूप भी देखने को मिलते हैं। ब्रिटिश काल में जब वन कानून लागू किए गए, तब खरवार समाज की पारंपरिक जीवन प्रणाली को गंभीर क्षति पहुँची।
औपनिवेशिक प्रभाव
अंग्रेजों के शासन में वन क्षेत्रों को सरकारी संपत्ति घोषित कर दिया गया। इससे खरवार समाज जैसे वन-आधारित समुदायों की आजीविका प्रभावित हुई। जंगलों से लकड़ी, फल, कंद-मूल लेने पर रोक लगी। इससे इस समाज में गरीबी, विस्थापन और सामाजिक असंतोष बढ़ा।
कई खरवार लोगों ने जन आंदोलनों में भाग लिया। उन्होंने अपने जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए संघर्ष किया। यह संघर्ष उनके आत्मसम्मान और अधिकार चेतना का प्रतीक है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि खरवार समाज केवल एक जातीय समूह नहीं बल्कि प्रकृति-आधारित जीवन दर्शन का प्रतिनिधि है। उनका इतिहास संघर्ष, सह-अस्तित्व और संस्कृति संरक्षण की कहानी है।
